Saturday, 15 May 2021

आखिर बलराम महाभारत युद्ध में हिस्सा क्यूं नहीं लिया...

  
       महाभारत के युद्ध में हजारों योद्धाओं ने हिस्सा लिया, चाहे वो पांडव के पक्ष में रहे हों या कौरव के पक्ष में। लेकिन दिलचस्प बात यह रही कि कृष्ण के साथ हमेशा रहने वाले बलराम ने महाभारत में हिस्सा नहीं लिया। यह इतिहासकारों के साथ साथ आम लोगों के लिए भी विचारणीय विषय है।
        शास्त्रों के अनुसार कहा गया है कि बलराम नहीं चाहते थे कि वे युद्ध में हिस्सा लें क्योंकि उनके लिए कौरव और पांडव दोनों ही प्रिय थे। बलराम ने कृष्ण को बहुत समझाने की कोशिश भी की थी कि हमदोनों को इस युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए।
     बलराम सीधे जाकर धर्मराज युधिष्ठिर के पास आकर बैठ गये और दुखी मन से कहा- "मैंने श्रीकृष्ण को बहुत समझाया कि वो इस युद्ध में हिस्सा न ले लेकिन कान्हा को अर्जुन इतने प्रिय है कि वो पाण्डवों की ओर से लड़ने के लिए तैयार हो गये। अब जिस ओर कृष्ण हो, उसके खिलाफ दूसरे खेमे में मैं कैसे जाऊं। बलराम ने यह कहते हुए दुविधा जताई कि, "भीम और दुर्योधन दोनों ने ही उनसे गदा सीखा है और दोनों ही मुझे प्रिय हैं, ऐसे में इन्हें आपस में लड़ते हुए देख पाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। कृष्ण को भी यही सुझाव दिया कि युद्ध में हिस्सा न ले क्योकि दोनों ही पक्ष हमारे सम्बन्धी हैं, और किसी एक का पक्ष लेना दूसरे के साथ अन्याय करना है। दोनों ही पक्ष अधर्म कर रहे हैं और इसमें यदि हम सम्मिलित हुए तो हम भी अधर्मी कहलाएंगे, इसलिए मैं तीर्थयात्रा पर जा रहा हूँ।"
      यह कहकर बलराम ने सब से विदा ली और तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। वे युद्ध के अंतिम दिन कुरुक्षेत्र पहुंच गए थे, तथा दुर्योधन और भीम का गदा युद्ध भी देखा। जिसमे कृष्ण ने भीम को इशारे से बता दिया कि दुर्योधन की जंघा पर वार करे। भीम ने ऐसा ही किया और दुर्योधन की मृत्यु हो गयी। कृष्ण की इस पक्षपात वाली हरकत से बलराम अत्यंत क्रोधित भी हुए थे। किन्तु कृष्णा ने उन्हें अपने मनमोहक तर्क वितर्क से शांत कर दिया।
टिप्पणी- आखिर बलराम के मन में यह दुविधा ही क्यू उत्पन्न हुई? महाभारत या अन्य ग्रंथों में जब कौरवों को क्रुर, अत्याचारी और अधर्मी दिखाया गया है तो फिर बलराम एक अधर्मी के पक्ष से क्यू लड़ना चाहते थे? उनका कौरवों का पक्ष लेना कहीं न कहीं इस बात की ओर इशारा करता है कि जिस तरह फिल्म, धारावाहिक या ग्रंथ में कौरवों का चरित्र दिखाया गया है, वास्तविकता अवश्य ही उससे अलग रहा होगा। जैसे हर कहानियों में एक पक्ष को अच्छा बताने के लिए दूसरे पक्ष को कमजोर और गलत दिखाना साहित्यकारों की मजबूरी बन जाती है। क्योंकि 'महाभारत' में हो सकता है कि कौरव प्रमुख दुर्योधन गलत हो लेकिन उनके तरफ से लड़ने वाले योद्धा व परिवारजन भी गलत थे? जैसे- भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्र नरेश शल्य, भूरिश्रवा, अलम्बुष, कृतवर्मा कलिंगराज श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण और बृहद्वल आदि।
अगर गौर किया जाय तो 'कृष्ण के पक्ष न लेने वाले तमाम योद्धाओं को या तो अधर्मी, क्रुर बताता गया है या उसे राक्षस की संज्ञा दी गयी है। वरना महान दानी और वीर योद्धा मगध सम्राट जरासंध (जिसे शास्त्रों में दानी और वीर कहा गया, जिनके विरूद्ध कोई क्रुरता या अधर्म नहीं दिखता) को साहित्यकार गलत परिचय नहीं देंते। केवल कृष्ण को अपने दामाद का हत्यारा मानने और पांडवों के साम्राज्य विस्तार और चक्रवर्ती बनाने की राह में आने के कारण उन्हें साहित्य वर्ग ने गलत रूप में प्रस्तुत किया।

Saturday, 16 January 2021

शिक्षित बनो

"वजह अनंत है, असफलता को मजबूरी का नाम देना।
इतिहास लेकिन कब सीधे रास्तों की लिखी गयी है।"
       हर व्यक्ति का कुछ न कुछ सपना होता है। कुछ उसे हासिल कर लेते हैं और कुछ परिस्थितियों का हवाला देते हुए अपने अरमानों को दफ्न कर देते हैं। ज्यादातर मामलों में गरीबी और पिछड़ापन बड़ा कारण रहा है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या कोई ब्राह्मस्त्र ऐसा है, जो अत्यंत दबे-कुचले, पिछड़े लोगों के जीवन में नया सूर्योदय ला सके।
     इसे कुछ उदाहरणों के रूप में देखते हैं- "थोड़ी देर के लिए मान लेते कि डॉ॰ भीम राव अम्बेडकर शिक्षित नहीं होते" आप सोचिए फिर वर्तमान स्थिति कैसी होती। उन दिनों अंग्रेजों का राज था और जाति व पिछड़ेपन पर अत्याचार का बोलबाला था। वैसी परिस्थिति से अम्बेडकर साहब आगे आएं। और अपनी शिक्षित होने का सबसे बेहतर उपहार उन्होंने अपने समाज और उनके जैसे दबे-कुचले वर्गों को दिया, जिसके कारण आज बहुत हद तक भेदभाव से ग्रासित समाज उन्नति की ओर अग्रसर हो सका है।
   मैंने एक खबर पढ़ी जिसमें एक ट्रांसजेडर डॉक्टर बनी, जो देश की पहली ट्रांसजेंडर डाॅक्टर है। किसी भी ट्रांसजेंडर के जीवन में कष्ट और चुनौतियां ठूस-ठूसकर भरी रहती है। कोई उन्हें सम्मान नहीं देता। लेकिन आज अगर वह डॉ॰ या कुछ अन्य ट्रांसजेंडर जज, विधायक, न्यूज एंकर आदि है, वह अपने बुद्धि व शिक्षित होने के कारण ही सम्मानित हो रहे हैं।
    अनगिनत उदाहरण हमसभी के आसपास मिल जाएगा, जिसमें व्यक्ति कभी बहुत गरीब रहा होगा लेकिन जब वह मेहनत करके नौकरी हासिल कर लेता है तब उसका व उसके परिवार का जीवन ही बदल जाता है। मतलब कि शिक्षा एक ऐसा हथियार है जिसका उपयोग कर आप अपना वर्तमान व भविष्य बदल सकते हैं।
    आज गाँव में देखें तो जात पात चरम सीमा पर दिखता है; लेकिन जब उसी गाँव के पढ़े लिखे बच्चें बाहर में नौकरी करते हैं और बिना जात पात देखे अपनी ही कंपनी में कार्यरत कर्मचारी से विवाह कर लेते हैं और थोड़ी अनबन के बाद उनके माता-पिता भी इसे स्वीकार कर लेते हैं, उस समय जात-पात निगण्य हो जाती है।
      इसका सीधा एक मतलब निकलता है कि शिक्षा से ही सामाजिक बुराईयों को मिटाया जा सकता हैं। इसलिए किसी भी वर्ग के लिए यह आवश्यक है कि अगर वे अपना उत्थान चाहते हैं तो शिक्षित बनें और अपने आसपास के लोगों को भी शिक्षित करें। तभी एक बेहतर व सशक्त समाज के साथ समृद्ध भारत का निर्माण संभव है।
                         🖊: अमित राजन चंद्रवंशी

Wednesday, 6 January 2021

अकबर दरबार के चन्द्रवंशी चित्रकार

     अकबर के समय के प्रमुख चित्रकार मीर सैय्यद अली, दसवंत, बसावन, ख्वाज़ा, अब्दुस्समद, मुकुंद आदि थे। आइने अकबरी में कुल 17 चित्रकारों का उल्लेख है।
मुगल काल के चित्रों ने अकबर के शासन काल में विकास में बड़े पैमाने का अनुभव किया। चूँकि अकबर महाकाव्यों, कथाओं में रुचि रखता था इसलिए उसके काल के चित्र रामायण, महाभारत और फारसी महाकाव्य पर आधारित है।
       अकबर के दरबार में न सिर्फ सम्भ्रांत व्यक्तियों को बल्कि दबे कुचले‌ समाज से आने वाले कलाकारों को भी सम्मानित किया गया जिसका वर्णन भारतीय चित्रकला के लेखक श्रीमान् पर्सी-ब्राउन ने इस रूप में किया है- "अकबर काल के चित्रकारों के अध्ययन से यह दिलचस्प बात स्पष्ट होती है कि कला का स्थान जाति-पाति से बहुत ऊँचा था।" अकबर के दरबार के बहुत सारे मशहूर कलाकार समाज के दबे-कुचले समाज के थे जिनमें प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार दासवंत एवं अन्य दो चित्रकार केशु एवं बसावन "कहार" जाति के थे। (कहार-एक पेशा है तथा इस समाज के लोग मगध सम्राट जरासंध के वंशज अर्थात् चंद्रवंशी क्षत्रिय है, जो कई साक्ष्यों के आधार पर साबित हो चुकी है और बिहार सरकार चन्द्रवंशी का जाति प्रमाण पत्र भी निर्गत करती है)
     अकबर द्वारा शुरू की गई सबसे प्रारंभिक पेंटिंग परियोजनाओं में से तूतीनामा महत्त्वपूर्ण थी। यह 52 भागों में विभाजित थी।
     दसवंत द्वारा बनाए गए चित्र रज़्मनामा नामक पांडुलिपि में मिलते हैं। अब्दुस्समद के राजदरबारी पुत्र मोहम्मद शरीफ ने रज़्मनामा के चित्रण कार्य का पर्यवेक्षण किया था। इसकी दो अन्य कृतियाँ हैं- ‘खानदाने तैमुरिया’ एवं ‘तूतीनामा’। रज़्मनामा पांडुलिपि को मुगल चित्रकला के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। अकबर ने चित्रकार दसवंत को साम्राज्य का अग्रणी कलाकार घोषित किया था। रज्मनामा के अतिरिक्त प्रमुख चित्रित पांडुलिपि है-रामायण एवं अकबरनामा।
       बसावन, अकबर के समय का सर्वोत्कृष्ट चित्रकार था। वह चित्रकला में सभी क्षेत्रों, रंगों का प्रयोग, रेखांकन, छवि चित्रकारी तथा भू-दृश्यों के चित्रण का सिद्धहस्त था। उसकी सर्वोत्कृष्ट कृति है- एक मृतकाय (दुबले-पतले) घोड़े के साथ एक मजनू का निर्जन क्षेत्र में भटकता हुआ चित्र।
        अकबरकालीन चित्रकला में नीला, लाल, पीला, हरा, गुलाबी और सिंदूरी रंगों का इस्तेमाल हुआ। सुनहरे रंग का भी प्रचुरता से प्रयोग किया गया। इस काल में राजपूत चित्रकला का प्रभाव भी दिखाई देता है।
       नदी के किनारे चलते एक जैन मुनि (ca.1600) जैसे 100 से अधिक चित्रों का निर्माता बसावन को माना जाता है। उनका सबसे पहला उल्लेख तूतीनामा (1556-1561) के सचित्र संस्करण में मिलता है। इनमें से अधिकांश चित्र पांडुलिपियों के लिए हैं। इनमें से कई में, बसावन एक दूसरे कलाकार के साथ डिजाइनर थे, जिन्होंने रंग की आपूर्ति की। जिन कामों के लिए निश्चित रूप से बसावन को श्रेय दिया जा सकता है, उनमें राजमनामा, अकबर-नामा, दरब-नामा, जमी के बहारिस्तान और तैमूर-नामे के चित्र शामिल हैं। बसावन पश्चिमी तकनीकों में रुचि रखने वाले पहले भारतीय कलाकारों में से एक थे, और जेसुइट मिशनरियों द्वारा अकबर के दरबार में लाई गई यूरोपीय पेंटिंग से प्रेरित थे। यह प्रकाश और छाया के मजबूत विरोधाभासों के उनके उपयोग में देखा जा सकता है, हालांकि पश्चिमी प्रभाव उनके काम में प्रमुख नहीं है। बसावन को अंतरिक्ष की खोज, उनकी पृष्ठभूमि के परिसीमन, उनके रंगों की ताकत और उनके विषयों की मजबूत, चलती चरित्रों के लिए भी जाना जाता है। अकबर महान के इतिहासकार, अबू अल-फ़दल 'अल्लामी (अबुल फ़ज़ल), ने बसावन के बारे में लिखा है: "डिजाइनिंग और पोर्ट्रेट पेंटिंग और रंग भरने और भ्रम के रूप में पेंटिंग बनाने में... उनका दुनिया में कोई मुक़ाबला नहीं था"।
          दसवंत बाद में मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया था और उसने 1584ई. में आत्म हत्या कर ली थी। वहीं चित्रकार केशु के बारे में अत्याधिक जानकारी नहीं दी उपलब्ध हो सकी है।
                                      # अमित राजन