Thursday, 31 December 2015

अधूरा प्यार

जहन में  तेरी बेवफाई
आज भी सुई चुभोता है,
कोई पल नहीं ऐसा गुजरता,
जिसमें तु न होता है।

मेरी पाक मुहब्बत को,
ऐसे झुठलाया तुमने
वो लब्ज तेरे थे, ये यकीन
आज तक न आता है।

ए मेरे हमनवां, मेरे हमराही
मेरी खता बता दो,
क्यू भूली वो सारे कसमें
फ़कत यही कोई न समझाता है।

गर यही होना था तो
वो सुनहरे सपने क्या थे,
यही सोचते रात गुजरती है
और नींद न आता है।

अब तो चंद पलों का
मैं इस जहां का वशिंदा हूं,
कैसे जी पाएगा तेरा 'अमीत'
कोई उम्मीद भी तो अब, न आता है।

Friday, 20 November 2015

इंसान अब सब कुछ है

सच्चाई को झुठलाते हुए
उसका स्वार्थ ही अब सब कुछ है
भूल बैठ अपने खुदा को
इंसान ही अब सब कुछ है!

कोई मजहब नहीं जो खून चाहे
वह़म फैला खुदा का नाम बताता है
भ्रम के पीछे उसका मतलब ही सबकुछ है
भूल बैठ...

उजाड़ देता है बस्तियाँ पलभर में
अपनी बात मनवाने के लिए
ऐसे दरिन्दे का अपना घर ही सबकुछ है!
भूल बैठ...

बेटियों की लूट जाती है आबरु
खुदा गुनहगार है जो लाचार बेटी बनाया
हैवानों का एकपल की खुशी ही सबकुछ है!
भूल बैठ...

छोटा सा एक घर बनाकर
सोचता है दुनिया इसी ने बनाया
घमंड में अंधे, इंसान का भ्रम ही सबकुछ है!
भूल बैठ अपने खुदा को
इंसान अब सबकुछ है।

Thursday, 19 November 2015

शहर

शहर की रौशनी में, कितना आराम है
यहाँ सङकें भागती है, खामोश अवाम है!

जिंदगी ढूंढते पहुंचे, उस सफर की तरफ
रास्ते सिधॆ पर दूर तक तन्हाई ही है
चमचमाते शहर में दूर खड़ा अकेला शाम है
शहर की...

दिन जश्नो का, कर्जों का बेहिसाब रात है
कहाँ हाथ फैलाए, हर कोई भिखारी है
जरूरत है बेसब्र सा, थकना भी हराम है
शहर की ...

ऊचे-ऊचे दीवारों और बेकद्र इंसानो को देखा
ऐसा लगा दिल और जजबात नहीं होगे शायद
चहचहाती झुग्गीयों को देख लगा, हां यहाँ इंसान है!
शहर की रौशनी में कितना आराम है!