जहन में तेरी बेवफाई
आज भी सुई चुभोता है,
कोई पल नहीं ऐसा गुजरता,
जिसमें तु न होता है।
मेरी पाक मुहब्बत को,
ऐसे झुठलाया तुमने
वो लब्ज तेरे थे, ये यकीन
आज तक न आता है।
ए मेरे हमनवां, मेरे हमराही
मेरी खता बता दो,
क्यू भूली वो सारे कसमें
फ़कत यही कोई न समझाता है।
गर यही होना था तो
वो सुनहरे सपने क्या थे,
यही सोचते रात गुजरती है
और नींद न आता है।
अब तो चंद पलों का
मैं इस जहां का वशिंदा हूं,
कैसे जी पाएगा तेरा 'अमीत'
कोई उम्मीद भी तो अब, न आता है।