Wednesday, 2 April 2025

रवानी वंश

*चंद्रवंशी क्षत्रिय रवानी राजपूतो का इतिहास -*

वंश - चंद्रवंश
कुल - रवानी (पुरुवंशी,भरतवंशी,कुरूवंशी,बृहद्रथवंशी)
कुलदेवी - बंदी (जरा) माता
कुलदेवी स्थान - राजगीर
कुल देवता- महादेव 
गोत्र - भारद्वाज
प्रमुख गद्दी - राजगीर
गढ़ व स्टेट - उमगा स्टेट, रवाणगढ़, बांधवगढ़ (1 वर्ष), चुनारगढ़ (543 ई.पु), कुमाऊं,
वेद - यजुर्वेद
उप वेद - धनुर्वेद
शाखा - मध्यान्दनीय 
सूत्र - कात्यायन (गृह)
वर्ण - क्षत्रिय 
जाति - राजपूत

 *इतिहास -* 
#रवानी वंश के क्षत्रिय राजपूतों ने 2800 वर्ष वैदक काल से लेकर कलियुग तक मगध पर शासन किया। रवानी वंश मगध (बिहार) को स्थापित एवं शासन करने वाला प्रथम एवं प्राचीनतम क्षत्रिय राजवंश है। रवानी वंश बृहद्रथ वंश का ही परिवर्तित नाम है। रवानी वंश की उत्पत्ति चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश से है, व इनकी वंश श्रंखला पुरुकुल की है। सबसे पहले यह कुल पुरुवंश कहलाया, फिर भरतवंश, फिर कुरुवंश, फिर बृहद्रथवंश कालांतर में इसी वंश को रवानी क्षत्रिय बोला जाता है। परंतु यह वही प्राचीन कुल पुरुकुल है, जो चंद्रवंशी राजा पूरू से चला एवं प्रथम कुल कहलाया। शासन स्थापित करने एवं निवास क्षेत्र में अपना मजबूत अस्तित्व रखने के कारण रवानी राजपूतों को उनका विरुद *रमण खड्ग खंडार* प्राप्त हुआ,जिसका अर्थ होता है, मूल स्थान छोड़ कर रवाना हुए अलग अलग स्थानों पर खंडित हुए एवं जहां जहां खंडित हुए खड्ग (तलवार) के दम पर वही शासन स्थापित किया एवं अपनी तलवार के दाम पर अपना अस्तित्व कायम रखा। इस वंश के नामकरण की मान्यता यह है कि मगध की जब मगध की सत्ता पलटी एवं 344 ई. पु ने शुद्र शासक महापद्म नंद मगध की गद्दी पर बैठा फिर उसके बाद जब उसका पुत्र धनानंद गद्दी पर आसीन हुए तो वह मगध की प्रजा पर अत्याचार करने लगा तथा अपनी शक्ति का दुरूपियोग करने लगा यह सब देख इन क्षत्रियों को यह अपने पूर्वजों द्वारा बसाई एवं सदियों शासित पवित्र भूमि का आपमान समझा एवं प्रतिशोध लेने की ठान ली इसका अवसर इन्हे चंद्रगुप्त द्वारा नंद पर युद्ध के प्रयोजन में मिला इन क्षत्रियों ने चंद्रगुप्त का साथ नंद के खिलाफ युद्ध में दिया एवं वीरता के साथ लड़े परन्तु नंद की विशाल सेना होने के कारण चंद्रगुप्त युद्ध हार गया एवं पंजाब चला गया तथा नंद मगध के क्षत्रियों पर अत्याचार करने लगा तथा विशेषकर इन चंद्रवंशी (जरासंध वंशी) क्षत्रियों पर इस जिस कारण यह क्षत्रिय पाटलिपुत्र से बाहर निकल कर अपनी पूर्वजों की भूमि पर रमण करने लगे जिस कारण यह अपने आपको रमण क्षत्रिय कह कर पुकारने लगे रमण शब्द का अपभ्रंश ही रवानी हुआ एवं रवानी का अर्थ होता है प्रवाह, तीक्ष्णता, धार, तेज, बीना रुकावट चलने वाला, इस कारण इन्होने यह शब्द अपने लिए उपयुक्त समझा एवं रवानी क्षत्रिय कहलाए। तत् पश्चात पांचवी या छठी शातबदी तक जाति व्यवस्था ढलने के कारण रवानी कुल के राजपूत कहलाए जाने लगे। अतः 328 ई.पु से मगध के क्षत्रिय राजवंश बृहद्रथवंश का परिवर्तित नाम रवानीवंश हुआ। तथा यह रवानी क्षत्रिय राजपूत कहलाए। इस वंश की 30 से अधिक शाखाएं बिहार में निवास करती है। कुंवर सिंह के सेनापति मैकू सिंह भी रवानी वंश की आरण्य शाखा के राजपूत थे।

 *पतन -* मगध पर शासन करने वाले इस वंश के अंतिम शासक जो जरासंध की 23 वीं पीढ़ी में हुए जिनका नाम रिपुंजय था, इनकी हत्या इन्ही के मंत्री शुनक ने छल पूर्वक कर दी थी, एवं अपने पुत्र प्रदोत को गद्दी पर बैठा दिया । परिमाण स्वरूप 520 ई.पु में उनके परिवार के सदस्यों को महल छोड़ कर चले जाना पड़ा। कुछ रवानी क्षत्रिय मगध से प्रस्थान कर गए, परंतु अन्य परिवार जनों ने मगध मे ही निवास किया। नन्द के अत्याचार के बाद रवानी रवानी क्षत्रियों ने छोटे - छोटे शासन स्थापित करे कुछ सामंत के रूप में रहे तथा कुछ जमींदार कुछ रवानी क्षत्रियों ने अपने गांव (ठिकाने) बसा कर क्षेत्र में अपना शक्तिशाली वर्चस्व कायम रखा तथा कुछ बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा दास बना लिए गए तथा दास बने क्षत्रियों के दयनीय स्थिति कर दी गई।

गढ़वाल के शक्तिशाली 52 गढ़ो में एक रवानी राजपूतो का गढ़ रवाणगढ़ भी है।

 *चंदेल (रवानी) की उत्पत्ति व इतिहास* 
 *वंश परिचय -* रवानी क्षत्रिय नंद के अत्याचारों से बचते हुए मगध से दक्षिण की ओर चेदी यानी आज के बुंदेलखंड में आकर बसे जहाँ एक समय उनके पूर्वज एवं जरासंध महाराज के दादाश्री, श्री चेदी राज उपरीचर वसु का शासन था, एवं जरासंध के शासनकाल में शिशुपाल ने भी जरासंध जी के नेतृत्व में चेदी की बागडोर सम्हाली थी। चंदेल अपना गोत्र चंद्रायन बतलाते हैं, जो किसी ऋषि से सम्बंध नहीं रखता। चंद्रायन मे दो शब्दों की संधि है चंद्रवंशी एवं पलायन यह दो शब्द जुट कर चंद्रायन बनाते हैं जो एक याददाश्त के तौर पर यह गोत्र अपनाया गया था, आज भी चंदेलों को चंद्रवंशी न लिखकर उपशाखा के रूप में चंद्रवंशी वंश लिखा जाता है, क्योंकि रवानीयों को आज भी कही कही चंद्रवंशी ही पुकारा जाता है एवं लिखा जाता है। जिस प्रकार 36 कुल मे रवानी न लिख कर चंद्रवंशी लिखा गया है। आज भी जीन चंदेलों को अपना मूल गोत्र भारद्वाज याद है वे अपना गोत्र भारद्वाज ही बतलाते हैं। एवं कई चंदेल तो अपनी प्राचीन कुलदेवी जरा माता का ही पूजन करते हैं। काशी नगरी के विद्वान लेखक श्री गोपीनाथ सिंह जी ने अपनी पुस्तक "रवानी अर्थात पतित चंदेल" में इसका अच्छा वर्णन किया है।

 *इतिहास -* अत्याचारों से बचते हुए बुंदेलखंड में बसे रवानी क्षत्रियों मे एक रवानी क्षत्रिय न्ननुक (चंद्रर्वमन) ने सामंत के रूप मे प्रतिहारों के यहां काम किया एवं प्रतिहारों का शासन कमज़ोर पड़ने पर स्वयं स्वतंत्र शासन 8 वीं शताब्दी में घोषित किया, एवं चंदेल वंश की स्थापना की। चन्देल वंश भारत का प्रसिद्ध राजवंश हुआ, जिसने 08वीं से 12वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से यमुना और नर्मदा के बीच, बुंदेलखंड तथा उत्तर प्रदेश के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर राज किया। चंदेल वंश के शासकों का बुंदेलखंड के इतिहास में विशेष योगदान रहा है। उन्‍होंने लगभग चार शताब्दियों तक बुंदेलखंड पर शासन किया। चन्देल शासक न केवल महान विजेता तथा सफल शासक थे, अपितु कला के प्रसार तथा संरक्षण में भी उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा। चंदेलों का शासनकाल आमतौर पर बुंदेलखंड के शांति और समृद्धि के काल के रूप में याद किया जाता है। चंदेलकालीन स्‍थापत्‍य कला ने समूचे विश्‍व को प्रभावित किया उस दौरान वास्तुकला तथा मूर्तिकला अपने उत्‍कर्ष पर थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं खजुराहो के मंदिर आज भी मौजूद हैं।

चंदेल शासन परंपरागत आदर्शों पर आधारित था। यशोवर्मन् के समय तक चंदेल नरेश अपने लिये किसी विशेष उपाधि का प्रयोग नहीं करते थे। धंग ने सर्वप्रथम परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर परममाहेश्वर कालंजराधिपति का विरुद धारण किया। कलचुरि नरेशों के अनुकरण पर परममाहेश्वर श्रीमद्वामदेवपादानुध्यात तथा त्रिकलिंगाधिपति और गाहड़वालों के अनुकरण पर परमभट्टारक इत्यादि समस्त राजावली विराजमान विविधविद्याविचारवाचस्पति और कान्यकुब्जाधिपति का प्रयोग मिलता है।

 *पतन -* 1203 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने परार्माददेव को पराजित कर कालिंजर पर अधिकार कर लिया और अंततः 1305 ई. में चन्देल राज्य दिल्ली में मिल गया।

रवानी राजपूत राज वंशावली==

१.ब्रह्म

२.अत्रि

३.चंद्र

४.बुद्ध

५.पुरुरवा

६.आयु

७.नहुष

८.ययाति

९.पुरु (पुरुवंश के संस्थापक)

१०.जनमेजय

११.प्राचीन्वान

१२.संयाति

१३.अहंयाति

१४.सार्वभौम

१५.जयत्सेन

१६.अवाचीन

१७.अरिह

१८.महाभौम

१९.अयुतनायी

२०.अक्रोधन

२१.देवातिथी

२२.अरिह

२३.ऋक्ष

२४.मतिनार

२५.तंसु

२६.ईलिन

२७.दुष्यंत

२८.भरत (भरतवंश तथा भारतवर्ष के संस्थापक)

२९.भुमन्यु

३०.सुहोत्र

३१.हस्ती (हस्तिनापुर के संस्थापक)

३२.विकुण्ठन

३३.अजमीढ़

३४.ऋक्ष

३५.संवरण

३६.कुरु (कुरुवंश तथा कुरुक्षेत्र के संस्थापक)

३७.सुधनु

३८.सुहोत्र

३९.च्यवन

४०.कृतक

४१.उपरीचर वसु

४२.बृहद्रथ (बृहद्रथ वंश तथा मगध के संस्थापक)

४३.जरासंध

४४.सहदेव

४५.सोमापी

४६.श्रुतश्रवा

४७.आयुतायु

४८.निरामित्र

४९.सुनेत्र

५०.वृहत्कर्मा

५१.सेनजीत

५२.श्रुतंजय

५३.विपत्र

५४.मुचि सुचि

५५.क्षमय

५६.सुवत

५७.धर्म

५८.सुश्रवा

५९.दृढ़सेन

६०.सुमित

६१.सुबल

६२.सुनीत

६३.सत्यजीत

६४.विश्वजीत

६५.रिपुंजय (मगध के अंतिम शासक) 543 ई.पु

६६.समरंजय

रिपुंजय के बाद चंंदेल वंश वंशावली

रिपुंजय 543 ई.पु

 । 
 । 
 ।
 ।
नन्नुक (831 - 845 ई.) (संस्थापक)

वाक्पति (845 - 870 ई.)

जयशक्ति चन्देल और विजयशक्ति चन्देल (870 - 900 ई.)

हर्ष चन्देल (900 - 925 ई.)

यशोवर्मन (925 - 950 ई.)

धंगदेव (950 - 1003 ई.)

गंडदेव (1003 - 1017 ई.)

विद्याधर (1017 - 1029 ई.)

विजयपाल (1030 - 1045 ई.)

देववर्मन (1050-1060 ई.)

कीरतवर्मन या कीर्तिवर्मन (1060-1100 ई.)

सल्लक्षणवर्मन (1100 - 1115 ई.)

जयवर्मन (1115 - 1120)

पृथ्वीवर्मन (1120 - 1129 ई.)

मदनवर्मन (1129 - 1162 ई.)

यशोवर्मन द्वितीय (1165 - 1166 ई.)

परमार्दिदेव अथवा परमल (1166 - 1203 ई.)

Wednesday, 3 January 2024

नया साल मुबारक हो

आप सब को नया साल मुबारक हो
ये पिकनिक-जश्न-धमाल मुबारक हो।

जो बित गया, बित गया अफसोस क्या
बाकि जो छूट गया, मलाल मुबारक हो।

हम अकेले, भले-चंगे हैं यारों
जो विवाहित हैं, ससुराल मुबारक हो।

कुछ मिलें कुछ जुदा हुए होंगे
नए रिश्तों का फिर जंजाल मुबारक हो।

काटते खूब चांदी अपने नेता
दिन अच्छे आएंगे कब, सवाल मुबारक हो।

प्रेरणा उमंग से हो सशक्त भारत
कामयाबी तुझे नौनिहाल मुबारक हो।

Saturday, 9 September 2023

हाँ, भई हम बिहारी है... - अमित कुमार राजन

हाँ, भई हम बिहारी है।
मस्तमौला अनाड़ी है।

हम बड़ी जल्दी हाँ बोल देते हैं
"ठीक है" कहकर मान जाते हैं
हमें मेहनत के काम में झिझक नहीं होती
यही खातिर हम सब काम कर पाते हैं
कन्हैया भी कह गये कर्म से बड़ा धर्म नहीं
फिर हम कौन हैं 
किसी काम को छोटा बड़ा आँकने वाले
लेकिन कुछ दूर दराज के बंधु
कटाक्ष मारकर कहते हैं कि बिहारी बिमारी है
हम फिर भी बुरा नहीं मानते
काहे कि अगले ही पल कहते हैं कि
एक बिहारी सौ पर भारी है
हाँ भई! हम बिहारी है।

हम ठेला लगाते हैं तो
बच्चों को IAS/IPS भी बनाते हैं
हम भले मजदूर दिखें मगर
इंजीनियर-वैज्ञानिक भी बन जाते हैं
हो सकता है हम टेक्निकल अधिक नहीं जानते
मगर लग्न से सबसे अधिक नौकरी पाते हैं
दुनिया जानती है हमको 
हम उगते और डूबते सूरज का छठ त्योहार मनाते हैं
हमारे यहाँ गरीब भी रखते खुद्दारी है
हाँ भई! हम बिहारी है।

बिन जाने यूं ही ताना-बाना ना बूनो
बिहार से अनभिज्ञ मेरे प्यारे साथी सुनो
दुनिया को गणतंत्र सिखाया बिहार ने
बौद्ध-जैन का फूल खिलाया बिहार ने
सुक्षुत्र सर्जरी के जन्मदाता हुए
राजनीति के चाणक्य, गणित के आर्यभट्ट ज्ञाता हुए
वात्स्यायन ने कामसूत्र रच दिया
अशोक का चक्र तिरंगे में बस गया
गुरू गोविन्द का जन्म पटना साहेब सिटी है
दुनिया का प्राचीनतम विश्वविद्यालय नालंदा यूनिवर्सिटी है
बाल्मिकी ने रामायण रच बिहार का मान बढाया
बिहार को समझने कई विदेशी यात्री आया
मौलाना हक, पीर अलि, हसन इमाम हुए
अनुग्रह, जेपी, कर्पूरी, वीर कुंवर सा वीर संतान हुए
देश का पहला राष्ट्रपति हमने दिया
हमारे यहाँ दिनकर, रेणु, भिखारी ठाकुर, बिस्मिल्ला खान हुए
भक्ति में वाणावर, बोलबम के पुजारी हैं
हाँ भई! हम वही बिहारी है।

Tuesday, 13 September 2022

कुलभूषण नथुनी प्रसाद सिंह जन्मदिन विशेषांक

******कुलभूषण नथूनी बाबू के जन्मदिन पर संक्षिप्त परिचय*****
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        देश की आजादी में सभी समाज के लोगों ने योगदान और बलिदान दिया। समय-समय पर विभिन्न जातियों ने भी जातिगत आंदोलन कर अंग्रेजों को एहसास दिलाया कि भारत विभिन्नताओं का देश अवश्य है, लेकिन हमारी एकता में भिन्नता नहीं है। अत: यह आवश्यक था कि विदेशियों का ऐसी जातियों द्वारा शोषण के विरूद्ध भी संघर्ष का शंखनाद किया जाय, जो उपेक्षित रहा हो। एक तरफ देश की आजादी की लड़ाई में भागीदारी लेना एवं दूसरी तरफ सामाजिक क्षेत्रों में एकता बनाकर चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को पूर्व के गौरव सम्मान एवं प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाना। इन दोनों कार्यों को एक साथ करना, उस अंग्रेजी हुकूमत के समय आसान काम नहीं था। फिर भी हमारे चन्द्रवंशी वीरों ने दोनों क्षेत्र में चिंतन एवं कार्रवाई जारी रखी। 
     इसी क्रम में स्व० नथुनी प्रसाद सिंह जी का प्रादुर्भाव हुआ और 13 सितम्बर 1856 ई० में पटना सिटी के मारुफगंज में जन्में बाबू नथुनी जी का लालन पालन बहुत ही सुखी माहौल में हुआ। इनके पिता बाबू श्यामलाल सिंह जी उस ज़माने के जाने माने एजेंट एवं आर्डर सप्लायर थे। बालक नथुनी जी ज्यों ज्यों बड़े हुए सादगी और व्यव्हार से ओत प्रोत होते गए और आगे चलकर उन्होंने चन्द्रवंशी समाज के अलावे शोषितों, दलितों के उत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
      नथुनी बाबू का परिवार शिक्षित और सम्पन्न था इसलिए नथुनी बाबू सभाओं में आते जाते रहते थे फिर एक दिन किसी बात की वजह से नथुनी बाबू को अंग्रेज और कुछ सामंती राजाओं ने कहार और छोटा जाति कह कर भरी सभा में अपमानित किया, नथुनी बाबू को यह अपमान दिल और दिमाग में बैठ गया और उसी दिन से अपने इतिहास के बारे में छानबीन करना शुरू कर दिये और ठान लिया कि अपना इतिहास ढूंढ कर ही रहूंगा, समय बिताना गया फिर ढूंढते ढूंढते नथुनी बाबू बुन्देलखण्ड जा पहुंचे जिसमें उन्हें रवानी अर्थात पतित चंदेल नाम की पुस्तक मिला , जिससे यह पता चला कि कैसे घनानंद के अत्याचार से कुछ चंद्रवंशी बुंदेलखंड आ पहुंचे और कुछ बिहार में ही रूक गए फिर नथुनी बाबू ने सारे कागज और किताब को लाकर अंग्रेजी हुकूमत के समाने रखा।
 समाज सेवा के इसी दौर में अपने छिपे लोगों की खोज की प्रक्रिया में सन् 1906 में एक राष्ट्रीय मंच की स्थापना की, जिसका नाम "ऑल इण्डिया चंद्रवंशी क्षत्रिय महासभा" रखा। महासभा का प्रथम अधिवेशन 1906 में नथूनी बाबू के नेतृत्व में हुआ, इस कार्यक्रम में ही इन्हें "कूलभूषण" की उपाधि से सम्मानित किया गया। सभी साक्ष्य अंग्रेजों के समक्ष रखने पर भी वे मानने को तैयार नहीं थे उनका कहना था कि पहले जांच पड़ताल चलेगा उसके बाद ही निर्णय लिया जाएगा, अंग्रेज सरकार की एक टीम इस कार्य पर लग गयी और अंतत यह साबित हो गया कि बुन्देलखण्ड में रह रहे रवानी या चंदेल और बिहार में रह रहे जो रवानी या रमाणी के नाम से, ये लोग और कोई नहीं बृहदथवंशी ही और चंद्रवंशी क्षत्रिय है और फिर अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा अखिल भारतवर्षीय चंद्रवंशी क्षत्रिय महासभा का रजिस्ट्रेशन 1912 में किया गया।     
      महासभा ने सन् 1918 ई० तक स्व० नथुनी प्रसाद सिंह के नेतृत्व में उस समय के राजे, राजवाड़े, नवाबों एवं अंग्रेजी हुकूमत के हुकामरानों से संघर्ष किया तथा उत्तरोत्तर गति से अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ती रही। बाद में डॉ० मुरलीधर सिंह, अमरनाथ सिंह, गोपीनाथ सिंह, महादेव सिंह, शिवनारायण सिंह, राय साहब सनातन सिंह, अमीरचंद सिंह, शालिग्राम सिंह, गंगा प्रसाद सिंह, शिव गुलाम सिंह, मंगल प्रसाद, प्राणनाथ सिंह, नन्द लाल सिंह, दमड़ी सिंह, त्रिवेणी नाथ दास, डॉ० रामरतन सिंह के नेतृत्व में महासभा के कार्यक्रम लाहौर से लेकर बंगाल तक सफलता पूर्वक चलता रहा।
# अमित राजन चन्द्रवंशी

Wednesday, 10 August 2022

चाचा पलटू

कुछ कहते मुझे विकास बाबू
कुछ कहते हैं चाचा पलटू
हमरी तो खासियत है यही
तु जलता है तो जल तू

शरीफ हो या भ्रष्टाचारी
हम मिलके रहते हैं सबसे
जाँच कमिटियाँ बैठा दूंगा
जो रखेगा दुश्मनी हमसे
हवा बनाना खूब है आता
इसी हवा में चल तू
कुछ कहते सुशासन बाबू
कुछ कहते हैं चाचा पलटू....

भाईयों-बहनों कहकर जिसने ठगा 
उसको भी हमने कहाँ छोड़ा
ये राजनीति है बिहार वासियों
दौड़ता हुआ बेलगाम घोड़ा
राज करेगा जद यूं ही
बिज पर चाहे पल तू
कुछ कहते मुन्ना भाई
कुछ कहते हैं चाचा पलटू

तुम ना समझोगे भावना
हमरी तो सबसे यारी है
कोई चाहे जो कहे 
हमें तो बस कुर्सी प्यारी
विपक्षी पिटे अब काहे छाती
आगाह किया था कि संभाल तू
कुछ कहते कुर्सी कुमार
कुछ कहते हैं चाचा पलटू।

यह कविता हास्य व काल्पनिक है।

Saturday, 15 May 2021

आखिर बलराम महाभारत युद्ध में हिस्सा क्यूं नहीं लिया...

  
       महाभारत के युद्ध में हजारों योद्धाओं ने हिस्सा लिया, चाहे वो पांडव के पक्ष में रहे हों या कौरव के पक्ष में। लेकिन दिलचस्प बात यह रही कि कृष्ण के साथ हमेशा रहने वाले बलराम ने महाभारत में हिस्सा नहीं लिया। यह इतिहासकारों के साथ साथ आम लोगों के लिए भी विचारणीय विषय है।
        शास्त्रों के अनुसार कहा गया है कि बलराम नहीं चाहते थे कि वे युद्ध में हिस्सा लें क्योंकि उनके लिए कौरव और पांडव दोनों ही प्रिय थे। बलराम ने कृष्ण को बहुत समझाने की कोशिश भी की थी कि हमदोनों को इस युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए।
     बलराम सीधे जाकर धर्मराज युधिष्ठिर के पास आकर बैठ गये और दुखी मन से कहा- "मैंने श्रीकृष्ण को बहुत समझाया कि वो इस युद्ध में हिस्सा न ले लेकिन कान्हा को अर्जुन इतने प्रिय है कि वो पाण्डवों की ओर से लड़ने के लिए तैयार हो गये। अब जिस ओर कृष्ण हो, उसके खिलाफ दूसरे खेमे में मैं कैसे जाऊं। बलराम ने यह कहते हुए दुविधा जताई कि, "भीम और दुर्योधन दोनों ने ही उनसे गदा सीखा है और दोनों ही मुझे प्रिय हैं, ऐसे में इन्हें आपस में लड़ते हुए देख पाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। कृष्ण को भी यही सुझाव दिया कि युद्ध में हिस्सा न ले क्योकि दोनों ही पक्ष हमारे सम्बन्धी हैं, और किसी एक का पक्ष लेना दूसरे के साथ अन्याय करना है। दोनों ही पक्ष अधर्म कर रहे हैं और इसमें यदि हम सम्मिलित हुए तो हम भी अधर्मी कहलाएंगे, इसलिए मैं तीर्थयात्रा पर जा रहा हूँ।"
      यह कहकर बलराम ने सब से विदा ली और तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। वे युद्ध के अंतिम दिन कुरुक्षेत्र पहुंच गए थे, तथा दुर्योधन और भीम का गदा युद्ध भी देखा। जिसमे कृष्ण ने भीम को इशारे से बता दिया कि दुर्योधन की जंघा पर वार करे। भीम ने ऐसा ही किया और दुर्योधन की मृत्यु हो गयी। कृष्ण की इस पक्षपात वाली हरकत से बलराम अत्यंत क्रोधित भी हुए थे। किन्तु कृष्णा ने उन्हें अपने मनमोहक तर्क वितर्क से शांत कर दिया।
टिप्पणी- आखिर बलराम के मन में यह दुविधा ही क्यू उत्पन्न हुई? महाभारत या अन्य ग्रंथों में जब कौरवों को क्रुर, अत्याचारी और अधर्मी दिखाया गया है तो फिर बलराम एक अधर्मी के पक्ष से क्यू लड़ना चाहते थे? उनका कौरवों का पक्ष लेना कहीं न कहीं इस बात की ओर इशारा करता है कि जिस तरह फिल्म, धारावाहिक या ग्रंथ में कौरवों का चरित्र दिखाया गया है, वास्तविकता अवश्य ही उससे अलग रहा होगा। जैसे हर कहानियों में एक पक्ष को अच्छा बताने के लिए दूसरे पक्ष को कमजोर और गलत दिखाना साहित्यकारों की मजबूरी बन जाती है। क्योंकि 'महाभारत' में हो सकता है कि कौरव प्रमुख दुर्योधन गलत हो लेकिन उनके तरफ से लड़ने वाले योद्धा व परिवारजन भी गलत थे? जैसे- भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्र नरेश शल्य, भूरिश्रवा, अलम्बुष, कृतवर्मा कलिंगराज श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण और बृहद्वल आदि।
अगर गौर किया जाय तो 'कृष्ण के पक्ष न लेने वाले तमाम योद्धाओं को या तो अधर्मी, क्रुर बताता गया है या उसे राक्षस की संज्ञा दी गयी है। वरना महान दानी और वीर योद्धा मगध सम्राट जरासंध (जिसे शास्त्रों में दानी और वीर कहा गया, जिनके विरूद्ध कोई क्रुरता या अधर्म नहीं दिखता) को साहित्यकार गलत परिचय नहीं देंते। केवल कृष्ण को अपने दामाद का हत्यारा मानने और पांडवों के साम्राज्य विस्तार और चक्रवर्ती बनाने की राह में आने के कारण उन्हें साहित्य वर्ग ने गलत रूप में प्रस्तुत किया।

Saturday, 16 January 2021

शिक्षित बनो

"वजह अनंत है, असफलता को मजबूरी का नाम देना।
इतिहास लेकिन कब सीधे रास्तों की लिखी गयी है।"
       हर व्यक्ति का कुछ न कुछ सपना होता है। कुछ उसे हासिल कर लेते हैं और कुछ परिस्थितियों का हवाला देते हुए अपने अरमानों को दफ्न कर देते हैं। ज्यादातर मामलों में गरीबी और पिछड़ापन बड़ा कारण रहा है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या कोई ब्राह्मस्त्र ऐसा है, जो अत्यंत दबे-कुचले, पिछड़े लोगों के जीवन में नया सूर्योदय ला सके।
     इसे कुछ उदाहरणों के रूप में देखते हैं- "थोड़ी देर के लिए मान लेते कि डॉ॰ भीम राव अम्बेडकर शिक्षित नहीं होते" आप सोचिए फिर वर्तमान स्थिति कैसी होती। उन दिनों अंग्रेजों का राज था और जाति व पिछड़ेपन पर अत्याचार का बोलबाला था। वैसी परिस्थिति से अम्बेडकर साहब आगे आएं। और अपनी शिक्षित होने का सबसे बेहतर उपहार उन्होंने अपने समाज और उनके जैसे दबे-कुचले वर्गों को दिया, जिसके कारण आज बहुत हद तक भेदभाव से ग्रासित समाज उन्नति की ओर अग्रसर हो सका है।
   मैंने एक खबर पढ़ी जिसमें एक ट्रांसजेडर डॉक्टर बनी, जो देश की पहली ट्रांसजेंडर डाॅक्टर है। किसी भी ट्रांसजेंडर के जीवन में कष्ट और चुनौतियां ठूस-ठूसकर भरी रहती है। कोई उन्हें सम्मान नहीं देता। लेकिन आज अगर वह डॉ॰ या कुछ अन्य ट्रांसजेंडर जज, विधायक, न्यूज एंकर आदि है, वह अपने बुद्धि व शिक्षित होने के कारण ही सम्मानित हो रहे हैं।
    अनगिनत उदाहरण हमसभी के आसपास मिल जाएगा, जिसमें व्यक्ति कभी बहुत गरीब रहा होगा लेकिन जब वह मेहनत करके नौकरी हासिल कर लेता है तब उसका व उसके परिवार का जीवन ही बदल जाता है। मतलब कि शिक्षा एक ऐसा हथियार है जिसका उपयोग कर आप अपना वर्तमान व भविष्य बदल सकते हैं।
    आज गाँव में देखें तो जात पात चरम सीमा पर दिखता है; लेकिन जब उसी गाँव के पढ़े लिखे बच्चें बाहर में नौकरी करते हैं और बिना जात पात देखे अपनी ही कंपनी में कार्यरत कर्मचारी से विवाह कर लेते हैं और थोड़ी अनबन के बाद उनके माता-पिता भी इसे स्वीकार कर लेते हैं, उस समय जात-पात निगण्य हो जाती है।
      इसका सीधा एक मतलब निकलता है कि शिक्षा से ही सामाजिक बुराईयों को मिटाया जा सकता हैं। इसलिए किसी भी वर्ग के लिए यह आवश्यक है कि अगर वे अपना उत्थान चाहते हैं तो शिक्षित बनें और अपने आसपास के लोगों को भी शिक्षित करें। तभी एक बेहतर व सशक्त समाज के साथ समृद्ध भारत का निर्माण संभव है।
                         🖊: अमित राजन चंद्रवंशी