Saturday, 5 December 2020

कर्म ही जीवन का वास्तविक धन है।

मैंने जन्म और मृत्यु के मध्य के जीवन के कई रूप को देखा है। लोगों को व्यक्तिगत स्वार्थ और दौलत के पीछे भागते, थकते और इंसान से हैवान तक का सफर देखा। बेशक धन इंसान की आवश्यकता है लेकिन इतना नहीं कि इंसान धन को सर्वश्रेष्ठ कह दें। धन से खरीदा गया सामान क्षणिक सुख दे सकता लेकिन वास्तविक सुख आपको ह्रदय की प्रसन्नता से ही मिल सकती हैं। 
       अगर आप याद करेंगे कि आपका सबसे खुशनुमा पल कब रहा है, तो ज्यादातर लोगों को अपना बचपन याद आएगा। किस्से, कहानियाँ, शरारतें, दोस्ती, छोटी-छोटी बातों पर झगड़े वगैरह-वगैरह। लेकिन इन सबों के बीच पैसा मौन ही रहता है, क्योंकि बचपन में हमारे पास पैसे नहीं होतें।
       मैंने बहुत से लोगों को पैसे की अहंकारिता देखी, और कुछ समय बाद कुछ घटनाओं के कारण उनके जीवन को उदासीन होते हुए भी देखा। कुछ ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने पैसे के आगे इंसान को अहमियत नहीं दी, लेकिन उनका अंत बुरा और अकेलेपन से घिरा ही मिला। लोगों को यहाँ तक कहते सुना- कि अच्छा हुआ मर गया। मतलब लोगों को रत्तीभर भी अफसोस नहीं हुआ ऐसे व्यक्ति के मौत पर। फिर ऐसे पैसे का क्या मोल? कुछ ने तो पैसे को अहमियत देते हुए खूब पैसे जमा किये लेकिन आखिरकार अपने ही बच्चों के हाथों ही अपना धन नहीं बचा सकें।
        जन्म और मृत्यु के मध्य वाले जीवन में मैंने कर्मों की सर्वश्रेष्ठता देखी। मैंने महसूस किया कि अच्छे सज्जन व्यक्ति अगर गरीब भी हो तो उसे पूरा सम्मान मिलता है, लोग फिक्रमंद होते हैं। अगर आप किसी व्यक्ति को मदद पहुँचाते हैं तो आपको इसके बदले भले कुछ प्राप्त न हुआ हो लेकिन आपकी आत्मा इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि मैंने किसी की मदद की। आपको अंदर से सुखद अनुभूति प्राप्त होगी। मेरे विचार से यह सबसे बेहतर खुशी है और इस बात को वर्षों बाद भी याद कर आपके चेहरे पर मुस्कान झलकेगा, जैसे बचपन की बातों पर होता है।
       समाजसेवा अगर सच्चे मन से की जाय तो वह भगवान की सेवा के तुल्य है। यह एक ऐसा धन है, जिसे प्राप्त कर्ता और दाता दोनों प्रसन्न होते हैं। इसलिए विद्वानों ने कहा है कि इस दुनिया के सारे रिश्ते-नाते चाहे वह जितना भी प्रिय हो, कमाया हुआ धन-दौलत चाहे जितना भी हो सबकुछ यही रह जाता है, अगर कुछ साथ जाएगा तो वह आपका कर्म ही होगा; जो आपके शरीर के नाश होने के बाद भी आपको जीवित रखता है। आज हम किसी देखते हैं कि कुछ सज्जन व कमर्ठ व्यक्तित्व वाले लोगों को भगवान का दर्जा दिया जा रहा है (उदाहरण- कबीर, गुरूनानक, साईं बाबा आदि) और कुछ महापुरुष सदैव के लिए अमर हो गये (उदाहरण- महात्मा गांधी, अम्बेडकर, विवेकानन्द आदि)। इन्होंने अपने जीवन को सार्थक रूप दिया और अपने जीवनकाल को कर्मों के आधार पर इतना सबल बना दिया कि हम आज इन्हें देवतुल्य मानते हैं।
                      # अमित राजन

Tuesday, 27 October 2020

कोरोना काल में चुनाव का रूप हो सकता था बेहतर - अमित राजन चंद्रवंशी

चुनाव में भीड़, रैलियाँ और जनसभाएँ आम बात होती है, लेकिन कोरोना काल में ये भीड़, रैलियाँ, मैदान से भरें खचाखच लोग गंभीर और विचारणीय विषय हैं।
      ये वही लोग है, जिन्होंने कोरोना पर बड़े बड़े उपदेश दिये और आम जनमानस का हवाला देते हुए कड़े फैसले लिये। रातोंरात ट्रेनें बंद हो गयी, राज्य की सीमाएँ या तो सुरक्षित कर दी गयी या शर्तों की जंजीरों से बांध दी गयी। कहीं पर लोग दाने-दाने को मोहताज नजर आएं तो कहीं पर सैकडों किलोमीटर की दूरी का दिल दहला देने वाले सफर का दर्द दिखा। असर आज भी देखा जा सकता है, आज भी सीमित ट्रेनें, बंद स्कूल आदि कोरोना की दास्तान लिए बैठी है।
        राज्य को सुरक्षित करने के लिए सीमाओं को सिल करने वाले और अपने ही नागरिकों को घर में नहीं घुसने देने की नसीहत वाले लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ में न्यूनतम संरक्षा और सुरक्षा की बातें भूल चुके हैं। आज भी ट्रेनों के अनाऊंसमेंट या टेलिविज़न के विज्ञापन सभी जगह मास्क और पर्याप्त दूरी का राग अलापा जा रहा है, लेकिन बिहार चुनाव की तस्वीरें देखकर छोटे बच्चे भी अवाक् रह जा रहे हैं। घर के माता-पिता जिन बच्चों को बहला-फुसलाकर बाहर नहीं जाने की नसीहत देते रहे हैं। वहीं बच्चे अपने पिता को न्यूज पर चुनाव की भीड़ पर अपने माता-पिता को झूठ और बहाना बनाने वाले कहने से जरा नहीं हिचक रहे है।
बच्चों के लोकप्रिय त्योहार दशहरा, जहाँ पहुँचकर वे अपने मनपसंद खिलौने और मिठाईयाँ खाते, उसपर भी कोरोना का प्रकोप और सरकार के निर्देश ने उन्हें घरों में कैद कर दिया, लेकिन सड़कों पर भीड़ देखकर बच्चे जरूर बाहर जाने की जिद्द करने लगते हैं। हालांकि बाहर की भीड़ दशहरे की न होकर चुनाव की है, लेकिन बच्चों को इस राजनीति को कैसे समझाया जाय?
      चुनाव प्रचार में तो कोरोना से सतर्कता केवल मंच पर आसिन बडे़ साहबों के लिए ही दिखा, बाकी तो कहीं सतर्कता जैसी चीज नहीं दिखी। अब यह रोचक होगा कि मतदान के दिन यह नियम किस तरह दिखता है। आशा है कि नियमों का कडई से पालन किया जाएगा।इसमें गलतियाँ केवल साहबों में नहीं बल्कि हमसभी में भी है, क्योंकि हम अपने सुरक्षा के फैसले खुद नहीं ले पाते। आसपास के लोगों के दबाव में आकर उनके साथ हो जाते हैं जबकि अगर ठीक से याद किया जाय तो महामारी के समय इन्हीं में से कुछ लोग मुसीबत के समय कोरोना का डर दिखाते हुए मदद से पीछे हट गये थे। यह तो शुक्र है कि अप्रिय घटना सामने नहीं आ रही है। नहीं तो यह महामारी कितनी भयावह हो सकती है, इसका ट्रेलर हमसभी देख चुके हैं।
     अगर गौर किया जाय तो एक अच्छी बात होते होते रह गयी। वर्षों से बुद्धिजीवि लोग चुनावी खर्चों को कम करने की बकालत करते रहें हैं। इस बार कोरोना के नाम पर इसपर पहल करना ही चाहिए था क्योंकि वक्त और नजाकत दोनों ही था लेकिन अफसोस की सभी चूक कर गये। जैसे आज IPL बिना audience का खेला जा रहा है, वैसे ही चुनाव भी बिना audience के होता। लोग अपने अपने पसंदीदा टीम के जगह पसंदीदा नेता को तय करते और वोट देते। इससे कोरोना के प्रति सजगता का पालन भी हो जाता और चुनावी खर्चों पर लगाम दोनों एक साथ हो सकता था। लेकिन स्वार्थ में डूबे राजनीतिक लोगों को इन बातों से क्या मतलब? उन्हें तो अपने पैसों का दमखम और शक्ति प्रदर्शन करने की फिक्र होती है।
        हमें अपनी जिम्मेदारी के साथ साथ अपने परिवार और आसपास की भी सुरक्षा करनी चाहिए। यह मेरा सभी से अपिल है कि मतदान के दिन मास्क, सोशल डिस्टेंशिंग और सतर्कता के हर पहलू पर पूरा पूरा ध्यान दें।

मतदाता अपने मन की सुने- अमित राजन चंद्रवंशी

विधानसभा चुनाव जनता के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा असर जनता पर ही पडता है। सड़क, अस्पताल, स्कूल व अन्य चीजों का निर्माण और विकास का जिम्मा आपके द्वारा चुने गये उम्मीदवारों पर ही निर्भर होता है, इसलिए यह काफी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमें अपने जनप्रतिनिधि का चयन सोच विचार कर करना चाहिए ताकि क्षेत्र का विकास और समस्याओं को दूर किया जा सके।
       मत देना हर नागरिक का अधिकार और कर्तव्य भी है। वोट डालने से आप न केवल एक अच्छा जनप्रतिनिधि चुनने में अपनी भागीदारी निभाते हैं बल्कि लोकतंत्र को भी मजबूती प्रदान करते हैं। हम आमतौर पर अपने नेताओं और सरकार को कोसते रहते हैं, लेकिन चुनाव में वोट देते समय लापरवाही बरतते हैं। जिसका खामियाजा हमें अगले पाँच वर्षों तक भुगतना पड़ता है। हमसभी को पांच साल में एक बार ही जनप्रतिनिधि चुनने का मौका मिलता है, तो क्या यह आवश्यक नहीं कि हमें सोच-विचार कर अपने किमती मत का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा न हो कि मत देने के बाद पछताना पड़ जाए। आपको खुद भी जागरूक होना चाहिए तथा दूसरों को भी सही जनप्रतिनिधि चुनने के लिए जागरूक करना चाहिए। क्योंकि अक्सर लोग उम्मीदवार का चयन खुद न करके, दूसरे के बातों में आकर फैसला ले लेते हैं। इसलिए आप खुद तय करें कि कौन बेहतर उम्मीदवार है? और यह आवश्यक है कि उम्मीदवार चुनते समय पार्टी को बिल्कुल न देखें क्योंकि कई बार आपके नापसंद पार्टी में भी अच्छे उम्मीदवार मिल सकते हैं। इसलिए अच्छे प्रत्याशी और काबलियत को अपने मतदान का अधिकार बनाएं। कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं होने की सूरत में नोटा का विकल्प चुने या निर्दलीय उम्मीदवार को एक मौका दें।
चुनाव के पहले प्रत्याशियों द्वारा अंधाधुंध किये जा रहे वादों पर बिल्कुल न जाएं, बल्कि यह परखे कि क्या यह बड़े बड़े वादें भले न कर रहा हो लेकिन क्या यह जनता के साथ समन्वय बनाने में सफल रहेगा? क्या जनप्रतिनिधि ईमानदार है और जनता की समस्याओं को दूर करने के लिए गंभीर है?
अगर हाँ, तो अपना फैसला, अपने मत के रूप में अवश्य दें।
        बिहार में ऐसी सरकार चाहिए जो रोजगार, शिक्षा, उद्योग व पर्यटन को बढावा दें। बिहार में पर्यटन के लिए बहुत से स्थान है, जिन्हें जीर्णोद्धार कर राजस्व को बढाया जा सकता है। नवादा का ककोलत, राजगीर का जरासंध अखाड़ा, सिद्धेश्वरी मंदिर, जरासंध द्वारा निर्मित साइक्लोनिक वाॅल जैसे बहुत से धरोहर को विकसित कर बिहार को गर्वांवित किया जा सकता है।

Monday, 26 October 2020

बिहार विधानसभा चुनाव में मानवता पर भारी दिखी राजनीति - अमित राजन

चुनाव में भीड़, रैलियाँ और जनसभाएँ आम बात होती है, लेकिन कोरोना काल में ये भीड़, रैलियाँ, मैदान से भरें खचाखच लोग गंभीर और विचारणीय विषय हैं।
      ये वही लोग है, जिन्होंने कोरोना पर बड़े बड़े उपदेश दिये और आम जनमानस का हवाला देते हुए कड़े फैसले लिये। रातोंरात ट्रेनें बंद हो गयी, राज्य की सीमाएँ या तो सुरक्षित कर दी गयी या शर्तों की जंजीरों से बांध दी गयी। कहीं पर लोग दाने-दाने को मोहताज नजर आएं तो कहीं पर सैकडों किलोमीटर की दूरी का दिल दहला देने वाले सफर का दर्द दिखा। असर आज भी देखा जा सकता है, आज भी सीमित ट्रेनें, बंद स्कूल आदि कोरोना की दास्तान लिए बैठी है।
        राज्य को सुरक्षित करने के लिए सीमाओं को सिल करने वाले और अपने ही नागरिकों को घर में नहीं घुसने देने की नसीहत वाले लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ में न्यूनतम संरक्षा और सुरक्षा की बातें भूल चुके हैं। आज भी ट्रेनों के अनाऊंसमेंट या टेलिविज़न के विज्ञापन सभी जगह मास्क और पर्याप्त दूरी का राग अलापा जा रहा है, लेकिन बिहार चुनाव की तस्वीरें देखकर छोटे बच्चे भी अवाक् रह जा रहे हैं। घर के माता-पिता जिन बच्चों को बहला-फुसलाकर बाहर नहीं जाने की नसीहत देते रहे हैं। वहीं बच्चे अपने पिता को न्यूज पर चुनाव की भीड़ पर अपने माता-पिता को झूठ और बहाना बनाने वाले कहने से जरा नहीं हिचक रहे है।
बच्चों के लोकप्रिय त्योहार दशहरा, जहाँ पहुँचकर वे अपने मनपसंद खिलौने और मिठाईयाँ खाते, उसपर भी कोरोना का प्रकोप और सरकार के निर्देश ने उन्हें घरों में कैद कर दिया, लेकिन सड़कों पर भीड़ देखकर बच्चे जरूर बाहर जाने की जिद्द करने लगते हैं। हालांकि बाहर की भीड़ दशहरे की न होकर चुनाव की है, लेकिन बच्चों को इस राजनीति को कैसे समझाया जाय?
      चुनाव प्रचार में तो कोरोना से सतर्कता केवल मंच पर आसिन बडे़ साहबों के लिए ही दिखा, बाकी तो कहीं सतर्कता जैसी चीज नहीं दिखी। अब यह रोचक होगा कि मतदान के दिन यह नियम किस तरह दिखता है। आशा है कि नियमों का कडई से पालन किया जाएगा।इसमें गलतियाँ केवल साहबों में नहीं बल्कि हमसभी में भी है, क्योंकि हम अपने सुरक्षा के फैसले खुद नहीं ले पाते। आसपास के लोगों के दबाव में आकर उनके साथ हो जाते हैं जबकि अगर ठीक से याद किया जाय तो महामारी के समय इन्हीं में से कुछ लोग मुसीबत के समय कोरोना का डर दिखाते हुए मदद से पीछे हट गये थे। यह तो शुक्र है कि अप्रिय घटना सामने नहीं आ रही है। नहीं तो यह महामारी कितनी भयावह हो सकती है, इसका ट्रेलर हमसभी देख चुके हैं।
     अगर गौर किया जाय तो एक अच्छी बात होते होते रह गयी। वर्षों से बुद्धिजीवि लोग चुनावी खर्चों को कम करने की बकालत करते रहें हैं। इस बार कोरोना के नाम पर इसपर पहल करना ही चाहिए था क्योंकि वक्त और नजाकत दोनों ही था लेकिन अफसोस की सभी चूक कर गये। जैसे आज IPL बिना audience का खेला जा रहा है, वैसे ही चुनाव भी बिना audience के होता। लोग अपने अपने पसंदीदा टीम के जगह पसंदीदा नेता को तय करते और वोट देते। इससे कोरोना के प्रति सजगता का पालन भी हो जाता और चुनावी खर्चों पर लगाम दोनों एक साथ हो सकता था। लेकिन स्वार्थ में डूबे राजनीतिक लोगों को इन बातों से क्या मतलब? उन्हें तो अपने पैसों का दमखम और शक्ति प्रदर्शन करने की फिक्र होती है।
        हमें अपनी जिम्मेदारी के साथ साथ अपने परिवार और आसपास की भी सुरक्षा करनी चाहिए। यह मेरा सभी से अपिल है कि मतदान के दिन मास्क, सोशल डिस्टेंशिंग और सतर्कता के हर पहलू पर पूरा पूरा ध्यान दें।