सच्चाई को झुठलाते हुए
उसका स्वार्थ ही अब सब कुछ है
भूल बैठ अपने खुदा को
इंसान ही अब सब कुछ है!
कोई मजहब नहीं जो खून चाहे
वह़म फैला खुदा का नाम बताता है
भ्रम के पीछे उसका मतलब ही सबकुछ है
भूल बैठ...
उजाड़ देता है बस्तियाँ पलभर में
अपनी बात मनवाने के लिए
ऐसे दरिन्दे का अपना घर ही सबकुछ है!
भूल बैठ...
बेटियों की लूट जाती है आबरु
खुदा गुनहगार है जो लाचार बेटी बनाया
हैवानों का एकपल की खुशी ही सबकुछ है!
भूल बैठ...
छोटा सा एक घर बनाकर
सोचता है दुनिया इसी ने बनाया
घमंड में अंधे, इंसान का भ्रम ही सबकुछ है!
भूल बैठ अपने खुदा को
इंसान अब सबकुछ है।
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