Thursday, 19 November 2015

शहर

शहर की रौशनी में, कितना आराम है
यहाँ सङकें भागती है, खामोश अवाम है!

जिंदगी ढूंढते पहुंचे, उस सफर की तरफ
रास्ते सिधॆ पर दूर तक तन्हाई ही है
चमचमाते शहर में दूर खड़ा अकेला शाम है
शहर की...

दिन जश्नो का, कर्जों का बेहिसाब रात है
कहाँ हाथ फैलाए, हर कोई भिखारी है
जरूरत है बेसब्र सा, थकना भी हराम है
शहर की ...

ऊचे-ऊचे दीवारों और बेकद्र इंसानो को देखा
ऐसा लगा दिल और जजबात नहीं होगे शायद
चहचहाती झुग्गीयों को देख लगा, हां यहाँ इंसान है!
शहर की रौशनी में कितना आराम है!

2 comments:

  1. Nice description of city.........A beautiful thaught in synchronise order. Cudoz to you.

    ReplyDelete