चुनाव में भीड़, रैलियाँ और जनसभाएँ आम बात होती है, लेकिन कोरोना काल में ये भीड़, रैलियाँ, मैदान से भरें खचाखच लोग गंभीर और विचारणीय विषय हैं।
ये वही लोग है, जिन्होंने कोरोना पर बड़े बड़े उपदेश दिये और आम जनमानस का हवाला देते हुए कड़े फैसले लिये। रातोंरात ट्रेनें बंद हो गयी, राज्य की सीमाएँ या तो सुरक्षित कर दी गयी या शर्तों की जंजीरों से बांध दी गयी। कहीं पर लोग दाने-दाने को मोहताज नजर आएं तो कहीं पर सैकडों किलोमीटर की दूरी का दिल दहला देने वाले सफर का दर्द दिखा। असर आज भी देखा जा सकता है, आज भी सीमित ट्रेनें, बंद स्कूल आदि कोरोना की दास्तान लिए बैठी है।
राज्य को सुरक्षित करने के लिए सीमाओं को सिल करने वाले और अपने ही नागरिकों को घर में नहीं घुसने देने की नसीहत वाले लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ में न्यूनतम संरक्षा और सुरक्षा की बातें भूल चुके हैं। आज भी ट्रेनों के अनाऊंसमेंट या टेलिविज़न के विज्ञापन सभी जगह मास्क और पर्याप्त दूरी का राग अलापा जा रहा है, लेकिन बिहार चुनाव की तस्वीरें देखकर छोटे बच्चे भी अवाक् रह जा रहे हैं। घर के माता-पिता जिन बच्चों को बहला-फुसलाकर बाहर नहीं जाने की नसीहत देते रहे हैं। वहीं बच्चे अपने पिता को न्यूज पर चुनाव की भीड़ पर अपने माता-पिता को झूठ और बहाना बनाने वाले कहने से जरा नहीं हिचक रहे है।
बच्चों के लोकप्रिय त्योहार दशहरा, जहाँ पहुँचकर वे अपने मनपसंद खिलौने और मिठाईयाँ खाते, उसपर भी कोरोना का प्रकोप और सरकार के निर्देश ने उन्हें घरों में कैद कर दिया, लेकिन सड़कों पर भीड़ देखकर बच्चे जरूर बाहर जाने की जिद्द करने लगते हैं। हालांकि बाहर की भीड़ दशहरे की न होकर चुनाव की है, लेकिन बच्चों को इस राजनीति को कैसे समझाया जाय?
चुनाव प्रचार में तो कोरोना से सतर्कता केवल मंच पर आसिन बडे़ साहबों के लिए ही दिखा, बाकी तो कहीं सतर्कता जैसी चीज नहीं दिखी। अब यह रोचक होगा कि मतदान के दिन यह नियम किस तरह दिखता है। आशा है कि नियमों का कडई से पालन किया जाएगा।इसमें गलतियाँ केवल साहबों में नहीं बल्कि हमसभी में भी है, क्योंकि हम अपने सुरक्षा के फैसले खुद नहीं ले पाते। आसपास के लोगों के दबाव में आकर उनके साथ हो जाते हैं जबकि अगर ठीक से याद किया जाय तो महामारी के समय इन्हीं में से कुछ लोग मुसीबत के समय कोरोना का डर दिखाते हुए मदद से पीछे हट गये थे। यह तो शुक्र है कि अप्रिय घटना सामने नहीं आ रही है। नहीं तो यह महामारी कितनी भयावह हो सकती है, इसका ट्रेलर हमसभी देख चुके हैं।
अगर गौर किया जाय तो एक अच्छी बात होते होते रह गयी। वर्षों से बुद्धिजीवि लोग चुनावी खर्चों को कम करने की बकालत करते रहें हैं। इस बार कोरोना के नाम पर इसपर पहल करना ही चाहिए था क्योंकि वक्त और नजाकत दोनों ही था लेकिन अफसोस की सभी चूक कर गये। जैसे आज IPL बिना audience का खेला जा रहा है, वैसे ही चुनाव भी बिना audience के होता। लोग अपने अपने पसंदीदा टीम के जगह पसंदीदा नेता को तय करते और वोट देते। इससे कोरोना के प्रति सजगता का पालन भी हो जाता और चुनावी खर्चों पर लगाम दोनों एक साथ हो सकता था। लेकिन स्वार्थ में डूबे राजनीतिक लोगों को इन बातों से क्या मतलब? उन्हें तो अपने पैसों का दमखम और शक्ति प्रदर्शन करने की फिक्र होती है।
हमें अपनी जिम्मेदारी के साथ साथ अपने परिवार और आसपास की भी सुरक्षा करनी चाहिए। यह मेरा सभी से अपिल है कि मतदान के दिन मास्क, सोशल डिस्टेंशिंग और सतर्कता के हर पहलू पर पूरा पूरा ध्यान दें।
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