******कुलभूषण नथूनी बाबू के जन्मदिन पर संक्षिप्त परिचय*****
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देश की आजादी में सभी समाज के लोगों ने योगदान और बलिदान दिया। समय-समय पर विभिन्न जातियों ने भी जातिगत आंदोलन कर अंग्रेजों को एहसास दिलाया कि भारत विभिन्नताओं का देश अवश्य है, लेकिन हमारी एकता में भिन्नता नहीं है। अत: यह आवश्यक था कि विदेशियों का ऐसी जातियों द्वारा शोषण के विरूद्ध भी संघर्ष का शंखनाद किया जाय, जो उपेक्षित रहा हो। एक तरफ देश की आजादी की लड़ाई में भागीदारी लेना एवं दूसरी तरफ सामाजिक क्षेत्रों में एकता बनाकर चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को पूर्व के गौरव सम्मान एवं प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाना। इन दोनों कार्यों को एक साथ करना, उस अंग्रेजी हुकूमत के समय आसान काम नहीं था। फिर भी हमारे चन्द्रवंशी वीरों ने दोनों क्षेत्र में चिंतन एवं कार्रवाई जारी रखी।
इसी क्रम में स्व० नथुनी प्रसाद सिंह जी का प्रादुर्भाव हुआ और 13 सितम्बर 1856 ई० में पटना सिटी के मारुफगंज में जन्में बाबू नथुनी जी का लालन पालन बहुत ही सुखी माहौल में हुआ। इनके पिता बाबू श्यामलाल सिंह जी उस ज़माने के जाने माने एजेंट एवं आर्डर सप्लायर थे। बालक नथुनी जी ज्यों ज्यों बड़े हुए सादगी और व्यव्हार से ओत प्रोत होते गए और आगे चलकर उन्होंने चन्द्रवंशी समाज के अलावे शोषितों, दलितों के उत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
नथुनी बाबू का परिवार शिक्षित और सम्पन्न था इसलिए नथुनी बाबू सभाओं में आते जाते रहते थे फिर एक दिन किसी बात की वजह से नथुनी बाबू को अंग्रेज और कुछ सामंती राजाओं ने कहार और छोटा जाति कह कर भरी सभा में अपमानित किया, नथुनी बाबू को यह अपमान दिल और दिमाग में बैठ गया और उसी दिन से अपने इतिहास के बारे में छानबीन करना शुरू कर दिये और ठान लिया कि अपना इतिहास ढूंढ कर ही रहूंगा, समय बिताना गया फिर ढूंढते ढूंढते नथुनी बाबू बुन्देलखण्ड जा पहुंचे जिसमें उन्हें रवानी अर्थात पतित चंदेल नाम की पुस्तक मिला , जिससे यह पता चला कि कैसे घनानंद के अत्याचार से कुछ चंद्रवंशी बुंदेलखंड आ पहुंचे और कुछ बिहार में ही रूक गए फिर नथुनी बाबू ने सारे कागज और किताब को लाकर अंग्रेजी हुकूमत के समाने रखा।
समाज सेवा के इसी दौर में अपने छिपे लोगों की खोज की प्रक्रिया में सन् 1906 में एक राष्ट्रीय मंच की स्थापना की, जिसका नाम "ऑल इण्डिया चंद्रवंशी क्षत्रिय महासभा" रखा। महासभा का प्रथम अधिवेशन 1906 में नथूनी बाबू के नेतृत्व में हुआ, इस कार्यक्रम में ही इन्हें "कूलभूषण" की उपाधि से सम्मानित किया गया। सभी साक्ष्य अंग्रेजों के समक्ष रखने पर भी वे मानने को तैयार नहीं थे उनका कहना था कि पहले जांच पड़ताल चलेगा उसके बाद ही निर्णय लिया जाएगा, अंग्रेज सरकार की एक टीम इस कार्य पर लग गयी और अंतत यह साबित हो गया कि बुन्देलखण्ड में रह रहे रवानी या चंदेल और बिहार में रह रहे जो रवानी या रमाणी के नाम से, ये लोग और कोई नहीं बृहदथवंशी ही और चंद्रवंशी क्षत्रिय है और फिर अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा अखिल भारतवर्षीय चंद्रवंशी क्षत्रिय महासभा का रजिस्ट्रेशन 1912 में किया गया।
महासभा ने सन् 1918 ई० तक स्व० नथुनी प्रसाद सिंह के नेतृत्व में उस समय के राजे, राजवाड़े, नवाबों एवं अंग्रेजी हुकूमत के हुकामरानों से संघर्ष किया तथा उत्तरोत्तर गति से अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ती रही। बाद में डॉ० मुरलीधर सिंह, अमरनाथ सिंह, गोपीनाथ सिंह, महादेव सिंह, शिवनारायण सिंह, राय साहब सनातन सिंह, अमीरचंद सिंह, शालिग्राम सिंह, गंगा प्रसाद सिंह, शिव गुलाम सिंह, मंगल प्रसाद, प्राणनाथ सिंह, नन्द लाल सिंह, दमड़ी सिंह, त्रिवेणी नाथ दास, डॉ० रामरतन सिंह के नेतृत्व में महासभा के कार्यक्रम लाहौर से लेकर बंगाल तक सफलता पूर्वक चलता रहा।
# अमित राजन चन्द्रवंशी
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